जाने 25 दिसंबर को क्यों मनाया जाता है क्रिस्मस ? और क्या है इसे बनाने का  इतिहास

इस बार कोरोना महामारी के चलते दुनिया भर में सभी त्योहारों पर जैसे रोक लग गई थी , लेकिन लोगों ने कई त्योहारों को इस बार सावधानी और सभी का ध्यान रखते  हुए अपने परिवार के बीच मनाया .  लेकिन अब जैसे- जैसे कोरोना  महामारी से लोगों को राहत मिलने लगी थी .वैसे ही कोरोना के एक नए स्ट्रेन ने  सभी को फिर अपने घर में कैद करने पर मजबूर क्जिर दिया .इसका सबसे ज्यादा असर ,ब्रिटेन ,इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में देखने को मिला वहां हालत पर काबू पाने के लिए वहां की सरकारों ने अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से दोबारा लॉकडाउन लगा दिया हैं . जिसके अंदर बाहर  से आने या जाने वालों पर रोक रहेगी . लेकिन कुछ देशों में सबसे ज्यादा सेलिब्रेट करने वाले  इस फ़ेस्टिवल तक सरकार ने  लॉकडाउन लगा दिया  है . ऐसे में इस बार क्रिस्मस डे का सेलिब्रेशन कुछ अलग होगा .वहीं सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए क्रिस्मस पार्टी स्पोट पर भी पाबंदी लगा दी गई है .ऐसे  में क्रिस्मस फ़ेस्टिवल का रंग कुछ अलग देखने को मिलेगा लेकिन दोस्तों और परिवार के साथ क्रिस्मस का त्योहार ख़ुशियों भरा ही रहेगा .सभी अपने हिसाब से इस दिन को खास बनाने के लिए कई तैयारियाँ कर चुके हैं.  इन अरेंजमेंट्स के साथ साथ कई लोगों की बचपन की यादें भी जुड़ीं है जो उनको हर साल क्रिस्मस का मौका आने पर सबको खुश कर जाती हैं . जैसे हम सब बचपन से देखते आ रहे है की क्रिस्मस के एक दिन पहले बच्चे जुराब में एक विश लिस्ट रखते हैं , जिसमें घर के लोग बच्चों का मन रखने के लिए चॉकलेट  या छोटी-मोटी चीजें रख देते हैं ,

25 दिसंबर को क्यों मनाया जाता है क्रिस्मस

हर साल 25 दिसंबर को पूरी दुनिया क्रिस्मस डे  के तौर पर मनाती है. 24 दिसंबर की शाम से इस त्योहार का जश्न शुरू हो जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर इस त्योहार को क्यों मनाया जाता है . क्रिस्मस जीसस क्रिस्ट के जन्म की खुशी में मनाया जाता है .जीसस क्रिस्ट को भगवान का बेटा कहा  जाता है . क्रिस्मस का नाम भी क्रिस्ट से पड़ा . बाइबल में जीसस की कोई बर्थ डेट नहीं दी गई है , लेकिन 25 दिसंबर को हर साल क्रिस्मस मनाया जाता है  . इस तारीख को लेकर कई बार विवाद भी हुआ . लेकिन 336 ई पूर्व में रोमन के पहले ईसाई रोमन सम्राट के समय में सबसे पहले क्रिस्मस 25 दिसंबर को मनाया जाता है.  इसके कुछ सैलून बाद पोप जूलियस ने आधिकारिक तौर पर जीसस के जन्म को 25 दिसंबर को ही मनाने का ऐलान किया.  प्रचलित कहानियों के अनुसार ईसाई समुदाय के लोग इसे  यीशु मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाते हैं , शुरुआत में ईसाई समुदाय के लोग यीशु यानी ईसा मसीह के जन्मदिन को एक त्यौहार के रूप में  मनाते थे ,लेकिन ,चौथी शताब्दी के आते-आते उनके जन्मदिन को एक त्योहार के तौर पर मनाया जाने लगा . हुआ यूं कि यूरोप में गैर ईसाई समुदाय के लोग सूर्य के उत्तरायण के मौके पर एक बड़ा त्योहार मनाते थे . इसमें प्रमुख था 25 दिसंबर को सूर्य के उत्तरायण होने का  त्योहार .इस तारीख से दिन के लंबा होना शुरू होने की वजह से ,इसे सूर्य देवता का पुन जन्म का दिन माना जाता था .कहा  जाता है कि इसी वजह से ईसाई समुदाय के लोगों ने इस दिन को यीशू के जन्मदिन के त्यौहार क्रिस्मस के तौर पर चुना .क्रिस्मस से  पहले ईस्टर ईसाई समुदाय  के लोगों का प्रमुख त्योहार था . क्रिस्मस को खास उसकी परम्पराएँ  बनाती हैं . इनमें एक संता निकोलस हैं . कहा जाता है इनका जन्म ईसा मसीह की मृत्यु के लगभग 280 साल बाद मायरा में हुआ था .उन्होंने अपना पूरा जीवन यीशू को समर्पित कर  दिया . उन्हें लोगों की मदद करना बेहद पसंद था .यही वजह ही कि वो यीशू के जन्मदिन के मौके पर रात के अंधेरे में बच्चों को गिफ्ट दिया करते थे . यही वजह है कि आज भी बच्चे अपने संता का इंतजार करते हैं . इसके अलावा एक और परंपरा है जिसे क्रिस्मस पर लोग जरुर पूरा करते है . कहा जाता  है कि यीशू मसीह भगवान का अंश थे उनके शरीर में कोमल और मुलायम पंख थे जिस कारण यीशू के जन्म के मौके पर एक फर के पेड़ को सजाया गया था ,जिसे बाद में क्रिस्मस ट्री  कहा जाने लगा . और उस पेड़ पर तमाम गिफ्ट लाइट्स से सजा कर  लोग उसे आज भी अपने घर पर रखते है और क्रिस्मस का त्योहार मनाते है .इसके साथ आधुनिक समय में  इस दिन कई लोग एक कार्ड के जरिए  अपनों को शुभकामनाएं देते हैं

 

 

By