भक्ति के लिए कर्म को न छोड़ने की प्रेरणा देने वाले महान संत हैं रविदास

आज संत रविदास जयंती हैं. 15 वीं शताब्दी में धर्म नगरी वाराणसी में जन्मे संत रविदास का जन्मोत्सव प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. संत रविदास निर्गुण भक्तिधारा के संत थे. भगवान श्री राम को अपना इष्ट मानने वाले रविदास एक कर्मयोगी भी थे. रविदास जूते बनाने का काम किया करते थे और साथ में राम नाम का कीर्तन किया करते थे. इस प्रकार भक्ति और कर्म दोनों को साधने वाले रविदास एक अनोखे और महान संत थे. संत रविदास को अनेकों सिद्धियाँ प्राप्त थीं फिर भी उन्होंने अपना जीवन बेहद साधारण तरीके से राम नाम का संकीर्तन करते हुए गुजार दिया.

एक संत होने के साथ साथ संत रविदास ने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी अपनी आवाज बुलंद की थी. उन्होंने ईश्वर की पूजा में आडंबर की जगह हृदय की पवित्रता को महत्ता दी. इस संबंध में उनका लिखा ‘मन चंगा तो कठौत में गंगा’ बेहद लोकप्रिय हैं. उन्होंने जाति पाती का विरोध किया. भक्ति के साथ कर्म करते रहने की प्रेरणा दी. ऐसा माना जाता है कि महाकवि तुलसीदास ने जब ‘रामचरित मानस’ लिखी तो सबसे पहले उन्होंने रविदास को ही दिखाया था. संत रविदास मीराबाई के धार्मिक गुरु थे.

बनारस में लगता है मेला

वैसे तो संत रविदास जयंती पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाई जाती है लेकिन बनारस जो रविदास की जन्मभूमि है वहाँ उनकी जयंती बेहद भव्य तरीके से मनाई जाती है. रविदास मंदिर में भव्य पूजा होती है, नगर में झांकी निकाली जाती है, मेले का आयोजन होता है.  

रविदास द्वारा रचित कुछ प्रसिद्ध दोहे

हिन्दू तुरक नहीं कछु भेद सभी मह एक रक्त और मासा

दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोई रैदासा.

हरि सा हीरा छांड कै, करै आन की आस

ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषे रविदास.  

 

 

 

By Pankaj Kumar