रौशनी के पर्व को परंपरागत तरीके से मनाएं, पटाखों से करें परहेज

कल देश और दुनिया में दीपावली की धूम रहेगी. अंधेरे पर प्रकाश की विजय के रूप में मनाए जाने वाले इस त्योहार के दिन सम्पूर्ण भारत एक सजे हुए दिव्य मंदिर के समान दिखता है. दीपावली के अवसर पर घरों को सजाया जाता है, लक्ष्मी और गणेश की पूजा की जाती है, मिठाइयां और गिफ्ट्स बांटे जाते हैं और ईश्वर से सबके जीवन को प्रकाशमान बनाए रखने की कामना की जाती है. अगर पौराणिक पृष्ठभूमि की बात करें तो ऐसा माना जाता है कि जब भगवान राम 14 वर्षों का वनवास काट कर अपनी जन्मभूमि अयोध्या लौटे थे तो अयोध्या वासियों ने श्री राम, लक्ष्मण और जानकी के अभिनंदन में अयोध्या सहित पूरे कौशल प्रदेश को दिव्य ज्योतियों से प्रकाशमान कर दिया था. उसी समय से दीपावली मनाने की शुरू हुई  परंपरा अबतक जारी है और अब भारतीय जीवन का अभिन्न और दिव्य हिस्सा बन चुकी है.

अगर आज के परिदृश्य में दीपावली की बात की जाए तो दीपावली मनाने की प्रक्रिया में अति आधुनिकता ने अपनी जड़े जमा ली हैं जो कहीं न कहीं रौशनी के इस त्योहार के परंपरागत महत्व को वर्ष दर वर्ष कम कर रही हैं. ऐसा नहीं है कि अब दीये नहीं जलाए जाते या पूजा नहीं होती. ये कार्य अब भी होते हैं लेकिन अधिकांशतः दीये की जगह आधुनिक लाइटों और मरकरियों ने ले ली है. दीपावली के अवसर पर लोगों ने पटाखे जलाने को एक प्रथा बना दिया है. जिससे देश में प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ जाता है. प्रदूषण हमारी प्रकृति के स्वास्थ्य को खराब करता है. आपको बता दें कि दीपावली पटाखों से निकलने वाली जहरीली गैसों का त्योहार नहीं है बल्कि दीप से निकलने वाली रौशनी का त्योहार है. इसलिए इस वर्ष दीपावली के अवसर पर आप अपने घर को दीप की रौशनी से सुंदर बनाएं, भक्ति भाव से गणेश लक्ष्मी की पूजा करें और परिवार तथा दोस्तों के बीच मिठाइयां बांटकर खाएं. पटाखों से परहेज करें. क्योंकि दीपावली प्रकृति को शुद्ध करने वाला त्योहार है न कि पटाखे जनित प्रदूषण से पर्यावरण को प्रदूषित करने का.

By Pankaj Kumar